हनुमान बाहुक की रचना स्वयं गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपनी गंभीर बाँह-पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए की थी। जिसे पढ़ते ही हनुमान जी प्रकट हो गए और उन्होंने तुलसीदास को न केवल रोगमुक्त किया, बल्कि यह वरदान भी दिया कि जो भी इस स्तोत्र का नियमित पाठ करेगा, उसके सभी कष्ट दूर हो जायेगें।
यदि आप हनुमान बाहुक पाठ हिंदी में PDF खोज रहे हैं, या जानना चाहते हैं कि हनुमान बाहुक पाठ करने की विधि क्या है और हनुमान बाहुक पाठ के लाभ क्या-क्या हैं, तो यह ब्लॉग पोस्ट आपके लिए ही है!
क्या है हनुमान बाहुक
एक बार जब तुलसीदास जी को अत्यंत गंभीर बाँह का दर्द हुआ तब पीड़ा से व्याकुल तुलसीदास ने हनुमान जी की शरण ली। स्वयं श्री हनुमान ने स्वप्न में प्रकट होकर उन्हें आदेश दिया कि “मेरी स्तुति में एक स्तोत्र रचो, इससे तुम्हारी पीड़ा दूर हो जाएगी।”
तत्पश्चात तुलसीदास ने हनुमान जी के निर्देशानुसार इस ४४ छंदों के इस स्तोत्र की रचना शुरू की। कहा जाता है कि तुलसीदास के द्वारा जैसे-जैसे इस स्तोत्र को लिखा गया, वैसे-वैसे उनकी बाँह का दर्द कम होता गया। और स्तोत्र के पूर्ण होते हीं उनका दर्द भी पूर्णतः समाप्त हो गया।
उसके बाद उन्होंने हनुमान जी से वरदान लिया कि जो भी इस स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करेगा, उसके सभी कष्ट दूर हो जायेगें।
श्री हनुमान बाहुक पाठ
चाहे आप शारीरिक पीड़ा से जूझ रहे हों, मानसिक तनाव में हों, या फिर किसी नकारात्मक ऊर्जाओं से जूझ रहे हों तो तुलसीदास कृत हनुमान बाहुक का नियमित रूप से किया गया पाठ आपके जीवन में सुरक्षा, शक्ति और शांति लाता है।












हनुमान बाहुक पाठ अर्थ सहित
हनुमान बाहुक गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा अवधी भाषा में रचा गया 44 छंदों का एक शक्तिशाली स्तोत्र है। इसमें प्रयोग किये गए कुछ ऐसे अवधी भाषा के शब्द और पदबंध हैं जो आधुनिक हिंदी पाठकों के लिए कठिन प्रतीत हो सकते हैं।
परंतु अच्छी खबर यह है कि हम उनके लिए इन सभी कठिन शब्दों की विस्तृत हिंदी व्याख्या भी उपलब्ध करा दिया है, जिससे कोई भी सामान्य पाठक इस दिव्य स्तोत्र का पुरे लाभ को प्राप्त कर सके।
॥ अथ श्री हनुमान बाहुक ॥
श्री गणेशाय नमः
श्रीजानकीवल्लभो विजयते
श्रीमद्-गोस्वामी-तुलसीदास-कृत
छप्पय
सिंधु-तरन, सिय-सोच-हरन,
रबि-बाल-बरन तनु ।
भुज बिसाल, मूरति कराल
कालहुको काल जनु ॥
गहन-दहन-निरदहन लंक निःसंक, बंक-भुव ।
जातुधान-बलवान-मान-मद-दवन पवनसुव ।।
कह तुलसिदास सेवत सुलभ
सेवक हित सन्तत निकट ।
गुन-गनत, नमत, सुमिरत, जपत
समन सकल-संकट-विकट ॥१॥
अर्थ: जिनके शरीर का वर्ण उदयकाल के सूर्य के समान है, जो समुद्र लाँघकर माता सीता के शोक को हरने वाले हैं, जिनकी भुजाएं लम्बी हैं, जिनका स्वरूप भयंकर है और जो मृत्यु के भी स्वामी हैं।
जिन्होंने निर्भय होकर लंका को भस्म कर दिया और जो टेढ़ी भौंहो वाले तथा जो बलशाली राक्षसों के बल, मान और घमंड को नष्ट करने वाले, पवनपुत्र हैं।
तुलसीदास जी कहते हैं – हनुमान जी सेवा करने पर सहज ही प्राप्त हो जाते हैं और अपने भक्तों के सदा निकट रहते हैं तथा उनके गुणों का गान, नमन, स्मरण और जप करने से सभी भयंकर संकट शांत भी हो जाते हैं ॥1॥
स्वर्न-सैल-संकास कोटि-रबि-तरुन-तेज-घन ।
उर बिसाल भुज-दंड चंड नख-बज बज्र-तन ॥।
पिग नयन, भृकुटी कराल रसना दसनानन ।
कपिस केस, करकस लंगूर,
खल-दल बल भानन ॥
कह तुलसिदास बस जासु उर
मारुतसुत मूरति बिकट ।
संताप पाप तेहि पुरुष पहिं
सपनेहुं नहिं आवत निकट ॥२॥
अर्थ: जिनका शरीर सुवर्ण-पर्वत के समान है और, जिनमें करोड़ों मध्याह्न के सूर्य के समान तेज का पुंज है। जिनकी छाती विशाल है, जो अत्यंत शक्तिशाली भुजाएँ वाले हैं तथा जिनके नाख वज्र के समान कठोर हैं।
जिनकी आँखें लाल हैं, भौंहें भयानक हैं और जिनका मुख, जीभ और दाँत अत्यंत विकराल हैं। जिनके बाल भूरे रंग के तथा पूँछ कठोर और दुष्टों की सेना व शक्ति का नाश करने वाले हैं।
तुलसीदास कहते हैं – जिस व्यक्ति के हृदय में पवनपुत्र हनुमान का यह प्रचंड स्वरूप निवास करता है, उस व्यक्ति के निकट दुःख और पाप स्वप्न में भी नहीं आते ॥2॥
झूलना
पंचमुख-छमुख-भृगु मुख्य भट असुर सुर,
सर्व-सरि-समर समरत्थ सूरो ।
बकुरो बीर बिरुदैत बिरुदावली,
बेद बंदी बदत पैजपूरो ।।
जासु गुनगाथ रघुनाथ कह, जासुबल,
बिपुल-जल-भरित जग-जलधि झूरो ।
दुवन-दल-दमनको कौन तुलसीस है,
पवन को पूत रजपूत रुरो ॥३॥
अर्थ: हे पवनपुत्र! आप ऐसे अद्वितीय और महान योद्धा हैं कि युद्ध में पंचमुखी शिव, षट्मुखी कार्तिकेय, भृगुकुल प्रधान परशुराम और असुरों के समान ही नहीं, बल्कि उनसे भी अधिक सामर्थ्यवान और पराक्रमी हैं।
वेदरुपी वन्दीजन अर्थात विद्वान भी आपकी वीरता का स्तुति-गान करते हुए आपकी यशोगाथा को प्रतिष्ठित करते हैं।
जिनके गुणों की गाथा स्वयं श्री रघुनाथ करते हैं, और जिनके अद्वितीय बल से अपार जल से भरे हुए संसार रूपी सागर भी सुख गया।
तुलसी के स्वामी, हे पवनपुत्र हनुमान, आपके बिना राक्षसों के दल का नाश करने वाला यहाँ दूसरा कौन है? ॥३॥
घनाक्षरी
भानुसों पढ़न हनुमान गये भानु मन-
अनुमानि सिसु-केलि कियो फेरफार सो ।
पाछिले पगनि गम गगन मगन-मन,
क्रम को न भ्रम, कपि बालक बिहार सो ॥
कौतुक बिलोकि लोकपाल हरि हर बिधि,
लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खभार सो ।
बल कैंधौं बीर-रस धीरज कै, साहस कै,
तुलसी सरीर धरे सबनि को सार सो ॥४॥
अर्थ: हनुमान जी विद्या प्राप्त करने के लिए जब सूर्यदेव के पास गए तब सूर्यदेव ने इसे बालकों का खेल समझकर यह बहाना किया कि “मैं स्थिर नहीं रह सकता, मेरी गति निरंतर है।”
तब हनुमान जी ने शिक्षा ग्रहण करने हेतु सूर्यदेव की ओर मुख करके पीठ की तरफ पैरों से धक्का लगाकर प्रसन्न मन से आकाश मार्ग में उलटी दिशा में यात्रा शुरू की, जिससे उनके शिक्षा के क्रम में कोई व्यवधान नहीं आया।
यह अद्भुत नज़ारा देखकर इंद्र आदि लोकपाल, भगवान विष्णु, शिव और ब्रह्मा की आँखें चकाचौंध हो गईं और उनके मन में अत्यधिक विस्मय व चिंता की लहर दौड़ गई।
यह अतुल्य बल किसका है? यह वीरता, धैर्य और साहस किसका है? ओ तुलसी! ऐसा लगता है जैसे हनुमान जी ने अपने शरीर में हीं समस्त दिव्य शक्तियों एवं गुणों का सार समाहित कर रखा है ॥४॥
भारत में पारथ के रथ केथू कपिराज,
गाज्यो सुनि कुरुराज दल हल बल भो ।
कल्यो द्रोन भीषम समीर सुत महाबीर,
बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो ॥
बानर सुभाय बाल केलि भूमि भानु लागि,
फलंग फलांग हते घाटि नभतल भो ।
नाई-नाई माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जोहैं,
हनुमान देखे जगजीवन को फल भो ॥५॥
अर्थ: महाभारत के युद्ध में अर्जुन के रथ के ध्वज-स्तंभ पर विराजमान श्री हनुमान जी ने जब गर्जना की, तो उस भयंकर ध्वनि को सुनकर कौरवों के राजा दुर्योधन की पूरी सेना में हलचल उत्पन्न हो गयी और उनका बल कमजोर पड़ गया।
वो महावीर पवनपुत्र हनुमान ने जो वीरता के समुद्र हैं और उनका बल अमृततुल्य है अपनी गर्जना से गुरु द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह जैसे महारथियों के मनोबल को भी दबा दिया।
यह वही हनुमान हैं जिन्होंने बाल्यकाल में स्वाभाविक रूप से, पृथ्वी से सूर्य तक के आकाश-मण्डल को एक छलाँग में ही पार कर लिया था।
अंत में सभी योद्धा मस्तक झुकाकर और हाथ जोड़कर श्री हनुमान जी की ओर देखने लगे। इस प्रकार हनुमान् जी का दर्शन पाने से उन्हें संसार में जीने का फल मिल गया ॥५॥
गो-पद पयोधि करि होलिका ज्यों लाई लंक,
निपट निसंक परपुर गलबल भो ।
द्रोन-सो पहार लियो ख्याल ही उखारि कर,
कंदुक-ज्यों कपि खेल बेल कैसो फल भो ॥
संकट समाज असमंजस भो रामराज,
काज जुग पूगनि को करतल पल भो ।
साहसी समत्थ तुलसी को नाह जाकी बांह,
लोकपाल पालन को फिर थिर थल भो ॥६॥
अर्थ: हनुमान जी ने विशाल समुद्र को गाय के खुर के गड्ढे के समान तुच्छ समझकर पार किया। लंका-जैसी नगरी को होलिका के सदृश जला डाला और बिल्कुल निडर होकर उन्होंने शत्रु की नगरी में हलचल मचा दी।
संजीवनी बूटी लाने के लिए द्रोणाचल पर्वत को उन्होंने केवल विचार मात्र से ही उखाड़ कर गेंद की तरह खेलते हुए उठा लाए, वह कपिराज के लिये बेल-फल के समान क्रीडा की सामग्री बन गया।
जब संजीवनी के अभाव में राम-सेना संकट में व्याकुल हो गई, तब हनुमान जी ने युगों में पूरे होने वाले कार्यों को भी एक क्षण में अपनी हथेली पर पूरा कर दिया।
हे साहसी और सामर्थ्यशाली हनुमान! तुलसीदास जी आपको बारम्बार नमन करते हैं। आपकी भुजाएँ ही सभी लोकपाल देवताओं के पालन-पोषण करने तथा उन्हें फिर से स्थिरता-पूर्वक बसाने का स्थान हुईं ॥६॥
कमठ की पीठि जाके गोडनि की गाड मानो,
नाप के भाजन भरि जल निधि जल भो ।
जातुधान-दावन परावन को दुर्ग भयो,
महामीन बास तिमि तोमनि को थल भो ॥
कुम्भकरन-रावन पयोद-नाद-ईधन को,
तुलसी प्रताप जाको प्रबल अनल भो ।
भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान,
सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो ॥७॥
अर्थ: धरती को धारण करने वाला कच्छप भी जिनके चरणों के दबाव से सम्पूर्ण समुद्र के जल को भरने के लिये मानो नाप के पात्र के समान प्रतीत होते हैं।
राक्षसों का नाश करते समय वह समुद्र ही उनके भागकर छिपने का गढ़ हुआ तथा वही विशाल मत्स्यों व मगरमच्छों के रहने का स्थान हुआ।
तुलसीदासजी कहते हैं – रावण, कुम्भकर्ण और मेघनाद रुपी ईंधन को जलाने हेतु जिनका प्रताप प्रचण्ड अग्नि के समान हुआ।
भीष्म पितामह कहते हैं – मेरे अनुमान के अनुसार श्री हनुमान के समान महाबली तीनों कालों और तीनों लोकों में कोई नहीं है ॥७॥
दूत रामराय को, सपूत पूत पौनको,
तू अंजनी को नन्दन प्रताप भूरि भानु सो ।
सीय-सोच-समन, दुरित दोष दमन,
सरन आये अवन, लखन प्रिय प्रान सो ॥
दसमुख दुसह दरिद्र दरिबे को भयो,
प्रकट तिलोक ओक तुलसी निधान सो ।
ज्ञान गुनवान बलवान सेवा सावधान,
साहेब सुजान उर आनु हनुमान सो ॥८॥
अर्थ: आप श्रीराम के दूत हैं, पवनदेव के श्रेष्ठ पुत्र हैं और माता अंजनी के आनंददाता पुत्र हैं। आपका प्रताप सूर्य के समान अत्यंत तेजस्वी और प्रखर है।
आप सीता जी के शोक को हरने वाले हैं, पाप और दोषों का नाश करने वाले हैं। आप शरणागतों की रक्षा करने वाले हैं तथा लक्ष्मण जी को प्राणों के समान प्रिय हैं।
तुलसीदासजी के दुस्सह दरिद्र-रुपी दसमुख रावण का नाश करने के लिये आप आश्रय रूप में तीनों लोकों में प्रकट हुए हैं।
आप ज्ञानवान हैं, गुणवान हैं, बलवान हैं और सेवा में सदा सजग रहते हैं। आप अत्यंत बुद्धिमान और कृपालु स्वामी हैं। हे प्रभु! मेरे हृदय में हनुमान जी का वास हो ॥8॥
दवन-दुवन-दल भुवन-बिदित बल,
बेद जस गावत बिबुध बंदीछोर को ।
पाप-ताप-तिमिर तुहिन-विघटन-पटु,
सेवक-सरोरुह सुखद भानु भोर को ॥
लोक-परलोक तें बिसोक सपने न सोक,
तुलसी के हिये है भरोसो एक ओर को ।
राम को दुलारो दास बामदेव को निवास,
नाम कलि-कामतरु केसरी-किसोर को ॥९॥
अर्थ: हे हनुमान! आप दुष्टों और उनके समूहों का विनाश करने वाले हैं, आपका बल तीनों लोकों में विख्यात है। वेद भी यशोगान करते हैं कि देवताओं को कारागार से छुड़ाने वाला आपके सिवा दूसरा कौन हो सकता है?
आप पाप और कष्ट रूपी अंधकार को ऐसे नष्ट कर देते हैं जैसे सूर्य की किरणें कुहासे को मिटा देती हैं तथा सेवक रुपी कमल को प्रसन्न करने के लिये प्रातः-काल के सूर्य के समान हैं।
इस तुलसी के हृदय में एकमात्र हनुमान जी का भरोसा है तथा स्वप्न में भी इस लोक और परलोक की चिन्ता नहीं है।
आप श्रीराम के अत्यंत प्रिय सेवक तथा स्वयं शिव के स्वरुप हैं। हे केसरीपुत्र! आपका नाम कलियुग में कल्पवृक्ष के समान मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाला है ॥9॥
महाबल-सीम महाभीम महाबान इत,
महाबीर बिदित बरायो रघुबीर को ।
कुलिस-कठोर तनु जोरपरै रोर रन,
करुना-कलित मन धारमिक धीर को ॥
दुर्जन को कालसो कराल पाल सज्जन को,
सुमिरे हरनहार तुलसी की पीर को ।
सीय-सुख-दायक दुलारो रघुनायक को,
सेवक सहायक है साहसी समीर को ॥१०॥
अर्थ: हे हनुमान! आप अपार बल के धनी, भयानक रूप वाले और महान शक्तियों से युक्त हैं। आपका पराक्रम भगवान श्रीराम के यश को भी बढ़ाने वाला है।
आपका शरीर वज्र के समान कठोर है और युद्ध में आपका पराक्रम अत्यंत प्रचंड होता है। लेकिन आपका मन करुणा से भरा हुआ, धर्म का पालन करने वाला और अत्यंत धैर्यवान है।
आप दुष्टों के लिए मृत्यु के समान भयानक हैं, सज्जनों के पालनकर्ता और रक्षक हैं, और स्मरण करने मात्र से तुलसी के दुःख और पीड़ा को हरने वाले हैं।
आप माता सीता को सुख देने वाले हैं और श्रीराम के अत्यंत प्रिय हैं। हे साहसी पवनपुत्र! आप अपने स्वामी के सेवकों के सदा सहायक रहते हैं ॥10॥
रचिबे को बिधि जैसे, पालिबे को हरि,
हर मीच मारिबे को, ज्याईबे को सुधापान भो ।
धरिबे को धरनि, तरनि तम दलिबे को,
सोखिबे कृसानु, पोषिबे को हिम-भानु भो ॥
खल~दुःख दोषिबे को, जन-परितोषिबे को,
मांगिबो मलीनता को मोदक सुदान भो ।
खल-दुःख दोषिबे को, जन-परितोषिबे को,
मांगिबो मलीनता को मोदक सुदान भो ।
आरत की आरति निवारिबे को तिहूं पुर,
तुलसी को साहेब हठीलो हनुमान भो ॥११॥
अर्थ: आप सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा के समान, पालन-पोषण के लिए विष्णु के समान, दुष्टों के विनाश के लिए रूद्र के समान, और प्राणदान देने के लिए अमृतपान के समान हैं।
आप धारण करने में पृथ्वी के समान, अंधकार को मिटाने में सूर्य के समान, सुखाने में अग्नि के समान, और पोषण करने में चंद्रमा और सूर्य के समान हैं।
आप दुष्टों को दुःख और दोष प्रदान करने वाले, भक्तों को पूर्ण संतुष्टि देने वाले, और याचना रूपी दरिद्रता को दूर करके मोदक अर्थात आनंद का उत्तम दान देने वाले हैं।
तीनों लोकों में जो भी पीड़ित और दुखी हैं, उनके कष्टों को दूर करने के लिए तुलसीदास जी के स्वामी श्री हनुमान जी दृढ़-प्रतिज्ञ हैं ॥11॥
सेवक स्योकाई जानि जानकीस मानै कानि,
सानुकरूल सूलपानि नवै नाथ नांक को ।
देवी देव दानव दयावने ह्वै जोर हाथ,
बापुरे बराक कहा और राजा रांक को ।।
जागत सोवत बैठे बागत बिनोद मोद,
ताके जो अनर्थ सो समर्थ एक आंक को ।
सब दिन रुरो पर पूरो जहां-तहां ताहि,
जाके है भरोसो हिये हनुमान हांक को ॥१२॥
अर्थ: श्रीराम (जानकीनाथ) हनुमान जी को अपना सेवक मानकर उन पर एहसान अर्थात कृतज्ञता का भाव रखते हैं। भगवान शिव सदैव उनके पक्ष में रहते हैं और स्वर्ग के अधिपति इंद्र भी उन्हें नमन करते हैं।
देवी, देवता और दानव सभी हनुमान जी के समक्ष दया के पात्र बनकर हाथ जोड़कर खड़े रहते हैं। ऐसे में फिर दूसरे सांसारिक बेचारे राजा या रंक (निर्धन) किस श्रेणी में हैं? अर्थात सभी हनुमान जी के आगे तुच्छ हैं।
जो भक्त जागते, सोते, बैठे, विहार करते या आनन्द में मग्न रहते हुए भी हनुमान जी की शरण में है, उसका अनिष्ट चाहने वाला ऐसा कौन सिद्धान्त या शक्तिशाली है?
जिसके हृदय में अंजनीनंदन हनुमान जी की हाँक (शरणागति का आश्वासन) का भरोसा है, वो हर दिन, हर स्थान पर सुरक्षित, समर्थ और पूर्ण रहता है ॥12॥
सानुग सगौरि सानुकरूल सूलपानि ताहि,
लोकपाल सकल लखन राम जानकी ।
लोक परलोक को बिसोक सो तिलोक ताहि,
तुलसी तमाइ कहा काहू बीर आनकी ॥
केसरी किसोर बन्दीछोर के नेवाजे सब,
कीरति बिमल कपि करुनानिधान की ।
बालक-ज्यों पालिहैं कृपालु मुनि सिद्ध ताको,
जाके हिये हुलसति हांक हनुमान की ॥१३॥
अर्थ: जिस व्यक्ति के प्रति श्री हनुमान जी प्रसन्न होते हैं, उस पर अपने गणों तथा माता पार्वती सहित भगवान शिव , समस्त लोकपाल (इन्द्रादि दिक्पाल), श्री रामचन्द्र जी, माता जानकी (सीता) और श्री लक्ष्मण जी प्रसन्न और अनुग्रहशील रहते हैं।
ऐसा भक्त इस लोक और परलोक के सभी शोकों से मुक्त हो जाता है। तुलसीदास जी कहते हैं, फिर उस व्यक्ति को तीनों लोकों में किसी अन्य योद्धा या शक्ति के आश्रय की लालसा क्यों होगी?
जिसके व्यक्ति का ह्रदय सदैव दया-निकेत केसरी-नन्दन श्री हनुमान की शरणागति में होता है, उसका समस्त मुनि और सिद्ध भी कृपालु होकर, बालक के समान पालन-पोषण करते हैं। उन करुणा के सागर कपीश्वर की कीर्ति ऐसी ही अत्यंत पवित्र और निर्मल है ॥13॥
करुनानिधान, बलबुद्धि के निधान मोद-
महिमा निधान, गुन-ज्ञान के निधान हौ ।
बामदेव-रुप भूप राम के सनेही,
नाम लेत-देत अर्थ धर्म काम निरबान हौ ।
आपने प्रभाव सीताराम के सुभाव सील,
लोक-बेद-बिधि के बिदूष हनुमान हौ ।
मन की बचन की करम की तिहूं प्रकार,
तुलसी तिहारो तुम साहेब सुजान हौ ॥१४॥
अर्थ: हे श्री हनुमान! आप करुणा के सागर हैं। आप बल और बुद्धि के भंडार, आनंद और महिमा के स्रोत तथा समस्त गुणों और ज्ञान के परम आश्रय हैं।
आप पवनदेव के पुत्र और शिवस्वरूप हैं, तथा भगवान् श्रीराम के अत्यंत प्रिय भक्त हैं। आपका नाम लेने मात्र से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थ प्राप्त हो जाते हैं।
आप अपनी दिव्य शक्ति से श्री रघुनाथ के शील-स्वभाव को भली-भाँति जानने वाले हैं। आप लोक-मर्यादा, वेदों और शास्त्रों की विधियों के पूर्ण ज्ञाता और विद्वान हैं।
तुलसीदास जी कहते हैं, आप अपने भक्तों के भीतर-बाहर सब कुछ जानने वाले सर्वज्ञ स्वामी हैं। मैं मन, वचन और कर्म से पूर्णतः आपका दास हूँ।
मन को अगम, तन सुगम किये कपीस,
काज महाराज के समाज साज साजे हैं ।
देव-बंदी छोर रनरोर केसरी किसोर,
जुग जुग जग तेरे बिरद बिराजे हैं ।
बीर बरजोर, घटि जोर तुलसी की ओर,
सुनि सकुचाने साधु खल गन गाजे हैं ।
बिगरी संवार अंजनी कुमार कीजे मोहि,
जैसे होत आये हनुमान के निवाजे हैं ॥१५॥
अर्थ: हे कपिराज श्री हनुमान! आपने भगवान् श्री राम के कार्यों को जो मन से सोचने में भी अत्यंत कठिन थें, उन्हें आपने पूरा साधन-समाज जुटाकर अपने शरीर से सरल कर सम्पन्न कर दिया।
हे केसरी नंदन! आप देवताओं को बंधन से मुक्त कराने वाले हैं और युद्धभूमि में भयंकर कोलाहल मचाने वाले वीर हैं। युग-युग से संसार में आपकी कीर्ति और यशोगाथा विराजमान है।
हे अत्यंत बलशाली वीर! तुलसीदास की ओर आपका बल क्यों घट गया, जिसको सुनकर साधुजन चिंतित हैं और दुष्ट लोग प्रसन्न हो रहे हैं।
हे अंजनीपुत्र श्री हनुमान! जिस प्रकार आप सदा अपने भक्तों पर कृपा करके उनकी बिगड़ी सँवारते आए हैं, उसी प्रकार मेरी बिगड़ी हुई स्थिति को भी सुधार दीजिए ॥15॥
सवैया
जान सिरोमनि हौ हनुमान
सदा जन के मन बास तिहारो ।
कारो बिगारो मैं काको कहा
केहि कारन खीझत हौं तो तिहारो ॥
साहेब सेवक नाते तो हातो
कियो सो तहां तुलसी को न चारो ।
दोष सुनाये ते आगेहूं को
होशियार हैं हों मन तौ हिय हारो ॥१६॥
अर्थ: हे हनुमान जी! आप ज्ञान के शिरोमणि हैं और अपने भक्तों के मन में आपका सदा निवास रहता है।
मैं किसी का क्या बिगाड़ सकता हूँ या हानि कर सकता हूँ? फिर भी किस कारण आप मुझसे नाराज़ हैं?
यदि आपने सेवक के नाते से मुझे त्याग दिया है, तो इसमें तुलसी का कोई वश नहीं है।
यद्यपि मेरा मन भीतर से हार गया है तो भी मेरा अपराध सुना दीजिये, मेरा दोष मुझे बता दीजिए, ताकि आगे के लिए मैं सावधान हो सकूँ ॥16॥
तेरे थपे उथपै न महेस,
थपै थिरको कपि जे घर घाले ।
तेरे निवाजे गरीब निवाज
बिराजत बैरिन के उर साले ॥
संकट सोच सबै तुलसी लिये
नाम फट मकरी के से जाले ।
बूढ़ भये, बलि, मेरिहि बार,
कि हारि परे बहुतै नत पाले ॥१७॥
अर्थ: हे वानरराज श्री हनुमान! जिसे आपने स्थापित किया हो, उसे स्वयं भगवान् शिव भी नहीं उजाड़ सकते। और जिस घर को आपने नष्ट कर दिया, उसे फिर कौन बसा सकता है?
हे गरीबों पर कृपा करने वाले श्री हनुमान! जिन पर आपकी कृपा होती है, वे अपने शत्रुओं के हृदय में पीड़ा और भय बनकर विराजमान रहते हैं।
तुलसीदास कहते हैं कि आपके नाम के स्मरण मात्र से सभी संकट और चिंताएँ मकड़ी के जाले की तरह फटकर नष्ट हो जाती हैं।
हे बलिहारी श्री हनुमान! क्या आप मेरी ही बारी में बूढ़े हो गए हैं? या बहुत से गरीबों की रक्षा करते-करते थक गए हैं, क्या इसी कारण मेरी सहायता में देर हो रही है? ॥17॥
सिंधु तरे, बड़े बीर दले खल,
जारे हैं लंक से बंक मवा से ।
तैं रनि-केहरि केहरि के बिदले
अरि-कुजर छैल छवा से ॥
तोसों समत्थ सुसाहेब सेई
सहै तुलसी दुख दोष दवा से ।
बानर बाज ! बढ़े खल-खेचर,
लीजत क्यों न लपेटि लवा-से ॥१८॥
अर्थ: आपने समुद्र को लाँघकर बड़े-बड़े दुष्ट और बलशाली राक्षसों का नाश किया और लंका जैसी टेढ़ी-मेढ़ी और दुर्गम गढ़ को जला डाला।
हे रणरूपी वन के सिंह! आपने शत्रु रूपी हाथी के बच्चों अर्थात राक्षसों को, एक सिंह की भाँति सहज ही विनष्ट कर डाला।
आप जैसे समर्थ और श्रेष्ठ स्वामी की सेवा करते हुए भी तुलसीदास दुःख और दोष की आग सहन कर रहा है—यह वास्तव में आश्चर्य की बात है।
हे वानर-रूपी बाज! दुष्ट रूपी पक्षी (खल-खेचर) बहुत बढ़ गए हैं। आप उन्हें बटेर की तरह पकड़कर नष्ट क्यों नहीं कर देते? ॥18॥
अच्छ-विमर्दन कानन-भानि
दसानन आनन भा न निहारो ।
बारिदनाद अकंपन कुभकरन्न-से
कुजर केहरि-बारो ॥
राम-प्रताप-हुतासन, कच्छ,
बिपच्छ, समीर समीर-दुलारो ।
पाप-तें साप-तें ताप तिहूं-तें
सदा तुलसी कहूं सो रखवारो ।।१९।।
अर्थ: हे अक्षयकुमार का वध करने वाले श्री हनुमान! आपने अशोक वाटिका का विध्वंस किया और रावण जैसे प्रतापी शत्रु के मुख की ओर देखकर भी उसकी कोई परवाह नहीं की।
मेघनाद, अकम्पन और कुम्भकर्ण जैसे महाबली शत्रु के मद को चूर्ण करने में आप किशोरावस्था वाले सिंह के समान हैं।
शत्रु रूपी तिनकों के ढेर को जलाने के लिए श्रीराम का प्रताप अग्नि के समान है और उस अग्नि को प्रज्वलित करने वाले पवनस्वरूप आप ही हैं।
तुलसीदास कहते हैं कि वही पवननन्दन हनुमान जी मुझे सदा पाप, शाप और संताप, इन तीनों से सुरक्षित रखने वाले हैं ॥19॥
जानत जहान हनुमान को निवाज्यौ जन,
मन अनुमानि बलि, बोल न बिसारिये ।
सेवा-जोग तुलसी कबहुं कहा चूक परी,
साहेब सुभाव कपि साहिबी संभारिये ॥
अपराधी जानि कीजै सासति सहस भांति,
मोदक मरे जो ताहि माहुर न मारिये ।
साहसी समीर के दुलारे रघुबीरजूके,
बांह पीर महाबीर बेगि ही निवारिये ॥२०॥
अर्थ: हे हनुमान जी! सारा संसार जानता है कि जिस पर आपकी कृपा होती है, वह सदा सुरक्षित और आनंदित रहता है। मैं मन ही मन आपकी प्रतिज्ञा का स्मरण कर बलि जाता हूँ—कृपया अपने वचन को न भूलिए।
हे स्वामी कपिराज! ये तुलसीदास कभी सेवा के योग्य ही कहाँ था। यदि कोई भूल हुई हो, तो अपनी स्वामित्व की मर्यादा और उदार स्वभाव को स्मरण कर मेरी रक्षा कीजिए।
यदि मुझे अपराधी समझते हों, तो हजारों प्रकार की सज़ा दे दीजिए, परंतु जो लड्डू से ही जीवित रह सकता है, उसे विष देकर न मारिए।
हे महाबली! आप साहसी हैं, पवनदेव के प्रिय पुत्र और श्रीराम के अत्यंत दुलारे हैं। कृपा करके मेरी भुजाओं की पीड़ा को शीघ्र ही दूर कीजिए।
बालक बिलोकि, बलि बारेतें आपनो कियो,
दीनबन्धु दया कीन्हीं निरुपाधि न्यारिये ।
रावरो भरोसो तुलसी के, रावरोई बल,
आस रावरीयै दास रावरो बिचारिये ॥
बड़ो बिकराल कलि, काको न बिहाल कियो,
माथे पगु बलि को, निहारि सो निवारिये ।
केसरी किसोर, रनरोर, बरजोर बीर,
बांहुपीर राहुमातु ज्यौ पारि मारिये ॥२१॥
अर्थ: हे दीनबन्धु! मैं आप पर बलि जाता हूँ। आपने बालक को देखकर उसे बचपन से ही अपना लिया और बिना किसी स्वार्थ के, अद्वितीय और निष्काम दया की।
इस तुलसी को आपका ही भरोसा, आपका ही बल और आपकी ही आशा है। कृपा करके मुझे अपना दास समझ मेरी ओर ध्यान दीजिए।
अत्यन्त भयानक कलिकाल ने किसको व्याकुल नहीं किया ? इस बलवान् कलि का पैर मेरे मस्तक पर भी देखकर उसको हटाइये।
हे केसरीनन्दन! आप रणभूमि में कोलाहल मचाने वाले, अत्यंत बलशाली वीर हैं। जैसे आपने राहु की माता सिंहिका को मार गिराया था, वैसे ही मेरी भुजाओं की पीड़ा को भी परास्त कर दीजिए।
उथपे थपनथिर थपे उथपनहार,
केसरी कुमार बल आपनो संभारिये ।
राम के गुलामनि को कामतरु रामदूत,
मोसे दीन दूबरे को तकिया तिहारिये ॥
साहेब समर्थ तोसों तुलसी के माथे पर,
सोऊ अपराध बिनु बीर, बांधि मारिये ।
पोखरी बिसाल बांहु, बलि, बारिचर पीर,
मकरी ज्यौ पकरि कै बदन बिदारिये ॥२२॥
अर्थ: हे केसरीकुमार! आप उजड़े हुए को बसाने वाले और बसे हुए को उजाड़ने वाले हैं। कृपा करके अपने उस अपार बल का स्मरण कीजिए।
हे रामदूत! आप श्रीराम के सेवकों के लिए कल्पवृक्ष के समान हैं। मुझ जैसे दीन और दुर्बल के लिए तो आप ही एकमात्र सहारा हैं।
हे समर्थ स्वामी! आपके रहते हुए भी तुलसीदास को कष्ट सहना पड़ रहा है। यदि कोई अपराध भी हो, तो बिना बताए इस प्रकार दंड देना उचित नहीं।
मैं आप पर बलिहारी जाता हूँ। मेरी भुजा विशाल तालाब के समान है और उसमें यह पीड़ा जलचर के समान है। कृपा करके इस पीड़ा को मगरमच्छ की तरह पकड़कर उसका मुख फाड़ दीजिए।
राम को सनेह, राम साहस लखन सिय,
राम की भगति, सोच संकट निवारिये ।
मुद-मरकट रोग-बारिनिधि हेरि हारे,
जीव-जामवंत को भरोसो तेरो भारिये ॥
कूदिये कृपाल तुलसी सुप्रेम-पव्बयते,
सुथल सुबेल भालू बैठि कैः बिचारिये ।
महाबीर बांकुरे बराक बांह-पीर क्यों न,
लंकिनी ज्यों लात-घात ही मरोरि मारिये ॥२३॥
अर्थ: मुझमें श्री रामचंद्र के प्रति स्नेह है, श्रीराम, श्री लक्ष्मण और माता सीता की कृपा से साहस भी है और श्री राम की भक्ति भी है—अतः मेरे शोक और संकट को दूर कीजिए।
आनन्द-रूपी वानर (मन) रोग-रूपी विशाल समुद्र को देखकर हार गया है, परंतु जीव-रूपी जाम्बवन्त को आप पर पूरा भरोसा है—उसका भार आप ही उठाइए।
हे कृपालु! इस तुलसी के सुंदर प्रेम-रूपी पर्वत से छलांग लगाइए और श्रेष्ठ स्थान (हृदय) -रूपी सुबेल पर्वत पर बैठे हुए जीव-रूपी जाम्बवन्त को संभालिए, जो आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।
हे महाबली, बाँके और पराक्रमी वीर! मेरी भुजा की पीड़ा रूपी लंकिनी को आप लात के प्रहार से क्यों नहीं मरोड़कर मार डालते—अर्थात् इस कष्ट को पूर्णतः नष्ट क्यों नहीं कर देते?
लोक-परलोकटूं तिलोक न बिलोकियत,
तोसे समरथ चष चारिहूं निहारिये ।
कर्म, काल, लोकपाल, अग-जग जीवजाल,
नाथ हाथ सब निज महिमा विचारिये ॥
खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर,
तुलसी सो देव दुखी देखियत भारिये |
बात तरुमूल बंहुसूल कपिकच्छरु-बेलि,
उपजी सकेलि कपिकेलि ही उखारिये ॥२४॥
अर्थ: इस लोक, परलोक और तीनों लोकों में—चारों दिशाओं से देखकर भी—आपके समान समर्थ कोई नहीं दिखाई देता।
हे नाथ! कर्म, काल, लोकपाल (देवता) तथा सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जीवसमूह—सब आपके ही हाथ में हैं। कृपा कर अपनी इस अपनी महिमा को विचारिये।
हे देव! तुलसी आपका निजी सेवक है, उसके हृदय में आपका वास है, फिर भी वह अत्यन्त दुःखी दिखाई देता है।
वात-व्याधि से उत्पन्न भुजा की पीड़ा केवाँच की बेल के समान है। कृपा करके उसकी जड़ को समेटकर, वानरी क्रीड़ा की तरह सहज ही उखाड़ फेंकिए—अर्थात् उसे पूर्णतः नष्ट कर दीजिए।
करम-कराल-कंस भूमिपाल के भरोसे,
बकी बकभगिनी काहू ते कहा डरैगी ।
बड़ी बिकराल बाल घातिनी न जात कदि,
बहुबल बालक छबीले छोटे छरैगी ॥
आई है बनाइ बेष आप ही विचारि देख,
पाप जाय सबको गुनी के पाले परैगी ।
पूतना पिसाचिनी ज्यौ कपिकान्ह तुलसी की,
बोंहपीर महाबीर तेरे मारे मरगी ॥२५॥
अर्थ: कर्म-रूपी भयानक कंस राजा के भरोसे रहने वाली बकासुर की बहिन पूतना किसी से क्यों डरेगी?
वह अत्यन्त भयंकर है, बालकों को मारने वाली है, जिसकी लीला कही नहीं जा सकती; वह अपने बाहुबल से सुन्दर, छोटे बालकों को छल लेती है।
आप स्वयं विचार करके देखिए, वह सुन्दर वेश बनाकर आई है। यदि वह आप जैसे गुणी के आश्रय में आ जाए तो सबका पाप नष्ट हो जाएगा।
हे महाबली कपिराज! तुलसी की भुजा की पीड़ा पूतना पिशाचिनी के समान है और आप बालकृष्ण के समान हैं—यह पीड़ा आपके ही प्रहार से नष्ट होगी।
भालकी कि कालकी कि रोष की त्रिदोष की है,
बेदन विषम पाप ताप छल छांह की ।
करमन कूट की कि जन्त्र मन्त्र बूट की,
पराहि जाहि पापिनी मलीन मन मांह की ॥
पैटहि सजाय, नत कहत बजाय तोहि,
बाबरी न होहि बानि जानि कपि नह की ।
आन हनुमान की दुहाई बलवान की,
सपथ महाबीर की जो रहै पीर बांह की ॥२६॥
अर्थ: यह भयंकर पीड़ा क्या कपाल की लिखावट है, या समय, क्रोध अथवा त्रिदोष की है, या पाप-ताप और छलरूप छाया का परिणाम है?
क्या यह मेरे कर्मों की गठरी है, या यंत्र-मंत्र और तंत्र-वृक्ष का फल है? हे पापिनी पूतना, अर्थात मैले मन वाली पीड़ा! भाग जा, यहाँ से चली जा।
मैं डंके की चोट पर चेतावनी देकर कहता हूँ—दंड भोगने से पहले ही चली जा; कपिराज हनुमान का स्वभाव जानकर भी मूर्खता मत कर।
मैं बलवान हनुमान की दुहाई देता हूँ और महाबीर की सौगंध खाता हूँ—अब यह भुजा की पीड़ा नहीं टिकेगी।
सिंहिका संहारि बल, सुरसा सुधारि छल,
लंकिनी पछारि मारि बाटिका उजारी है ।
लंक परजारि मकरी बिदारि बारबार,
जातुधान धारि धूरिधानी करि डारी है ॥
तोरि जमकातरि मंदोदरी कढ़ोरि आनी,
रावन की रानी मेघनाद महतारी है ।
भीर बांह पीर की निपट राखी महाबीर,
कौन के सकोच तुलसी के सोच भारी है ॥२७॥
अर्थ: आपने सिंहिका के बल का संहार किया, सुरसा के छल को सुधारा, लंकिनी को पछाड़कर मार डाला और अशोक वाटिका को उजाड़ दिया।
आपने लंका को जला डाला, बार-बार राक्षसों का संहार किया और बड़े-बड़े जातुधानों को धूल-धूसरित कर दिया।
आपने यमराज की तलवार समान कठोर मर्यादा को तोड़कर रावण की पटरानी मंदोदरी और मेघनाद की माता को भी राजमहल से बाहर निकाल दिया।
हे महाबली! आपने इतने बड़े-बड़े भय नष्ट कर दिए, फिर मेरी भुजा की पीड़ा को अब तक क्यों छोड़ रखा है? किसके संकोच में पड़कर तुलसी का इतना भारी शोक बढ़ा रहे हैं?
तेरो बालि केलि बीर सुनि सहमत धीर,
भूलत सरीर सुधि सक्र-रबि-राहु की ।
तेरी बांह बसत बिसोक लोकपाल सब,
तेरो नाम लेत रहै आरति न काहू की ॥
साम दान भेद बिधि बेदहू लबेद सिधि,
हाथ कपिनाथ ही के चोटी चोर साहु की ।
आलस अनख परिहास कै सिखावन है,
एते दिन रही पीर तुलसी के बाहु की ॥२८॥
अर्थ: हे वीर! आपके बालपन के खेल सुनकर बड़े-बड़े धीर भी भयभीत हो जाते हैं और इन्द्र, सूर्य तथा राहु तक अपने शरीर की सुध-बुध खो बैठते हैं।
आपकी भुजाओं के संरक्षण में सभी लोकपाल निश्चिंत होकर रहते हैं और आपका नाम लेने से किसी का भी दुःख शेष नहीं रहता।
साम, दान और भेद की नीति तथा वेद-उपवेदों से भी यह सिद्ध है कि चाहे चोर हो या साहूकार—सबकी चोटी कपिनाथ के ही हाथ में है, अर्थात् सब आपके अधीन हैं।
इतने दिनों से तुलसी की भुजा की जो पीड़ा बनी हुई है—क्या यह आपका आलस्य है, क्रोध है, परिहास है या कोई शिक्षा देने का उपाय?
टूकनि को घर-घर डोलत केगाल बोलि,
बाल ज्यों कृपाल नतपाल पालि पोसो है ।
कीन्ही है संभार सार अंजनी कुमार बीर,
आपनो बिसारि हैं न मेरेहू भरोसो है ॥
इतनो परेखो सब भोति समरथ आजु,
कपिराज सांची कहौं को तिलोक तोसो है ।
सासति सहत दास कीजे पेखि परिहास,
चीरी को मरन खेल बालकनि को सो है ॥२९॥
अर्थ: हे गरीबों के पालन करने वाले कृपानिधान! मैं तो कभी टुकड़े के लिए घर-घर भटकता था; आपने बुलाकर बालक की तरह मेरा पालन-पोषण किया।
हे वीर अंजनीकुमार! आपने ही मुख्य रूप से मेरी रक्षा की है; आप अपने सेवक को नहीं भूलेंगे—मुझे इसका पूर्ण भरोसा है।
आज आप सब प्रकार से समर्थ हैं; मैं सत्य कहता हूँ—तीनों लोकों में आपके समान कौन है?
फिर भी यह सेवक दंड और दुर्दशा सह रहा है, और आप उसे मानो परिहास की तरह देख रहे हैं—जैसे बालकों के खेल में एक चिड़िया मर जाती है।
आपने ही पाप तें त्रिपात ते कि साप तें,
बढ़ी है बाह बेदन कही न सहि जाति है ।
ओषध अनेक जन्त्र मन्त्र टोटकादि किये,
बादि भये देवता मनाये अधिकाति है ॥
करतार, भरतार, हरतार, कर्म काल,
को है जगजाल जो न मानत इताति है |
चेरो तेरो तुलसी तू मेरो कल्यो राम दूत,
ढील तेरी बीर मोहि पीर तें पिराति है ॥३०॥
अर्थ: मेरे ही पापों से, तीनों तापों से या किसी शाप के कारण यह भुजा की पीड़ा बढ़ गई है, जो न कही जा सकती है और न सही जाती है।
अनेक औषधियाँ, यंत्र-मंत्र और टोटके किए गए, देवताओं को भी मनाया गया, पर सब निष्फल रहा—पीड़ा और बढ़ती ही गई।
ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता), विष्णु (पालक), महेश (संहारक), कर्म, काल और सम्पूर्ण जगत—ऐसा कौन है जो आपकी आज्ञा का पालन नहीं करता?
तुलसी आपका दास है और आपने स्वयं मुझे अपना सेवक कहा है। हे वीर रामदूत! आपकी यह देर मुझे इस पीड़ा से भी अधिक पीड़ित कर रही है।
दूत राम राय को, सपूत पूत बाय को,
समत्व हाथ पाय को सहाय असहाय को ।
बांकी बिरदावली बिदित बेद गाइयत,
रावन सो भट भयो मुठिका के घाय को ॥
एते बड़े साहेब समर्थ को निवाजो आज,
सीदत सुसेवक बचन मन काय को ।
थोरी बांह पीर की बड़ी गलानि तुलसी को,
कौन पाप कोप, लोप प्रकट प्रभाय को ॥३१॥
अर्थ: आप राजा रामचन्द्र के दूत, पवनदेव के सत्पुत्र, हाथ-पाँव में समान रूप से समर्थ और असहायों के सहायक हैं।
आपकी सुन्दर यशगाथा विख्यात है, वेद भी उसका गान करते हैं, और रावण जैसा महान योद्धा भी आपके घूँसे की चोट से घायल हो गया था।
ऐसे बड़े और समर्थ स्वामी की कृपा होने पर भी आज आपका श्रेष्ठ सेवक तन, मन और वचन से कष्ट पा रहा है।
तुलसी को इस छोटी-सी भुजा की पीड़ा पर भी बड़ी ग्लानि है। यह किस पाप या किस क्रोध का फल है कि आपका प्रत्यक्ष प्रभाव अब लुप्त हो गया है?
देवी देव दनुज मनुज मुनि सिद्ध नाग,
छोटे बड़े जीव जेते चेतन अचेत हैं ।
पूतना पिसाची जातुधानी जातुधान बाम,
राम दूत की रजाइ माथे मानि लेत हैं ॥
घोर जन्त्र मन्त्र कूट कपट कुरोग जोग,
हनुमान आन सुनि छाडत निकेत हैं ।
क्रोध कीजे कर्म को प्रबोध कीजे तुलसी को,
सोध कीजे तिनको जो दोष दुख देत हैं ॥३२॥
अर्थ: देवी-देवता, दैत्य, मनुष्य, मुनि, सिद्ध, नाग तथा छोटे-बड़े जितने भी जड़-चेतन प्राणी हैं तथा पूतना, पिशाचिनी, राक्षसी और राक्षस जैसे कुटिल प्राणी हैं, वे सभी रामदूत श्री हनुमान की आज्ञा को सिर झुकाकर मानते हैं।
भयानक यंत्र-मंत्र, छल-कपट, धोखेबाज़ी और दुष्ट रोग हनुमान जी की दुहाई सुनते ही अपना स्थान छोड़ देते हैं।
मेरे खोटे कर्मों पर क्रोध कीजिए, तुलसी को सही मार्ग का बोध दीजिए और जो दोष हमें दुःख देते हैं उनका शोधन (नाश) कीजिए।
तेरे बल बानर जिताये रन रावन सों,
तेरे घाले जातुधान भये घर-घर के ।
तेरे बल रामराज किये सब सुरकाज,
सकल समाज साज साजे रघुबर के ॥
तेरो गुनगान सुनि गीरबान पुलकत,
सजल बिलोचन बिरंचि हरि हर के ।
तुलसी के माथे पर हाथ फेरो कीसनाथ,
देखिये न दास दुखी तोसो कनिगर के ॥३३॥
अर्थ: आपके ही बल से वानरों ने युद्ध में रावण को पराजित किया और आपके द्वारा मारे जाने से राक्षस घर-घर के (अर्थात् पूरी तरह नष्ट और तितर-बितर) हो गए।
आपके ही पराक्रम से श्रीराम ने देवताओं के सभी कार्य पूरे किए और रघुनाथ जी की पूरी सेना व व्यवस्था का साज-सामान आपने ही सुसज्जित किया।
आपके गुणों का गान सुनकर देवता रोमांचित हो जाते हैं और ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश की आँखें भी प्रेम और भाव से भर आती हैं।
हे वानरों के स्वामी! कृपा करके तुलसी के मस्तक पर अपना हाथ फेरिए। आप जैसे मर्यादा रखने वाले स्वामी अपने दास को दुःखी देखकर नहीं छोड़ते।
पालो तेरे टूक को परेहू चूक मूकिये न,
कूर कौड़ी दूको हौं आपनी ओर हरिये ।
भोरानाथ भोरे ही सरोष होत थोरे दोष,
पोषि तोषि थापि आपनी न अवडेरिये ॥
अबु तू हौ अंबुचर, अबु तू हों डिंभ सो न,
बूझिये बिलंब अवलंब मेरे तेरिये ।
बालक बिकल जानि पाहि प्रेम पहिचानि,
तुलसी की बांह पर लामी लूम फेरिये ॥३४॥
अर्थ: मैं आपके ही टुकड़ों पर पलने वाला हूँ। मेरी भूल हो भी जाए तो मौन होकर मुझे न छोड़ दीजिए। मैं तो दो कौड़ी का तुच्छ और पापी हूँ, पर आप अपनी कृपा की ओर देखिये।
हे भोले स्वामी! आप स्वभाव से भोले हैं, इसलिए थोड़े से अपराध पर ही रुष्ट हो जाते हैं। अब प्रसन्न होकर मेरा पालन-पोषण कीजिए और मुझे अपना सेवक मानकर तिरस्कृत न कीजिए।
यदि आप जल हैं तो मैं उसमें रहने वाली मछली हूँ; यदि आप माता हैं तो मैं छोटा-सा बालक हूँ। अब देर न कीजिए, मेरा एकमात्र सहारा आप ही हैं।
मुझे व्याकुल बालक समझकर, मेरे प्रेम को पहचानकर मेरी रक्षा कीजिए। हे हनुमान जी! तुलसी की पीड़ित बाँह पर अपनी लंबी पूँछ फेर दीजिए, जिससे उसकी पीड़ा सदा के लिए मिट जाए।
घेरि लियो रोगनि, कुजोगनि, कुलोगनि ज्यौ,
बासर जलद घन घटा धुकि धाई है ।
बरसत बारि पीर जारिये जवासे जस,
रोष बिनु दोष धूम-मूल मलिनाई है ॥
करुनानिधान हनुमान महा बलवान,
हेरि हंसि होकि फूंकि फौजैं ते उड़ाई है ।
खाये हुतो तुलसी कुरोग राढ़ राकसनि,
केसरी किसोर राखे बीर बरिआई है ॥३५॥
अर्थ: रोगों, अशुभ योगों और दुष्ट लोगों ने मुझे इस प्रकार चारों ओर से घेर लिया है, जैसे दिन के समय काले बादलों का घना समूह अचानक आकाश में उमड़कर दौड़ आता है।
जैसे अग्नि जवासे को जला देती है ठीक वैसे ही ये कष्ट, पीड़ा-रूपी जल बरसाकर मेरे यश और तेज को ऐसे झुलसा रहे हैं। बिना किसी अपराध के ही क्रोधपूर्वक मेरा जीवन धुएँ और मैल से भर गया है।
हे करुणा के भंडार, महाबली हनुमान जी! आप कृपा-दृष्टि से देखिए, मुस्कराइए और एक फूँक मारकर इन शत्रु-रूपी सेनाओं को उड़ा दीजिए।
हे केशरीकिशोर वीर! कुरोग-रूपी क्रूर राक्षस तुलसी को निगल चुका था, पर आपने अपने पराक्रम से मेरी रक्षा की और जीवन बचाया।
सवैया
राम गुलाम तु ही हनुमान
गोसांई सुसांई सदा अनुकूलो ।
पाल्यो हौ बाल ज्यों आखर दू
पितु मातु सों मंगल मोद समूलो ॥
बांह की बेदन बांह पगार
पुकारत आरत आनंद भूलो ।
श्री रघुबीर निवारिये पीर
रहौ दरबार परो लटि लूलो ॥३६॥
अर्थ: हे गोस्वामी हनुमान जी! आप श्रेष्ठ स्वामी और सदा श्री राम के सेवकों के हित में रहने वाले कृपालु प्रभु हैं।
आपने मुझे बालक की तरह पाला है। “राम-राम” ये दो अक्षर ही मेरे लिए माता-पिता के समान रहे हैं, जिनसे मुझे पूर्ण मंगल और आनंद की प्राप्ति हुई।
हे भुजाओं को आश्रय देने वाले प्रभु! मेरी बाँह की पीड़ा बहुत बढ़ गई है। इस दुःख के कारण मैं सारा आनंद भूलकर व्याकुल होकर आपको पुकार रहा हूँ।
हे रघुकुल के वीर हनुमान जी! मेरी इस पीड़ा को दूर कीजिये, जिससे मैं निर्बल और लाचार होकर भी आपके दरबार में पड़ा रह सकूँ।
घनाक्षरी
काल की करालता करम कठिनाई कर्थ,
पाप के प्रभाव की सुभाय बाय बावरे।
बेदन कुभांति सो सही न जाति राति दिन,
सोई बांह गही जो गही समीर डाबरे ॥
लायो तरु तुलसी तिहारो सो निहारि बारि,
सींचिये मलीन भो तयो है तिहूं तावरे ।
भूतनि की आपनी पराये की कृपा निधान,
जानियत सबही की रीति राम रावरे ॥३७॥
अर्थ: न जाने काल की भयानकता है कि कर्मों की कठीनता है, पाप का प्रभाव है अथवा स्वाभाविक बात की उन्मत्तता है।
रात-दिन अत्यन्त कष्टदायक पीड़ा हो रही है, जो सहन नहीं होती और उसी बाँह को पकड़े हुए हैं, जिसे कभी पवनकुमार हनुमान जी ने अपने हाथों से पकड़ा था।
तुलसी रूपी यह वृक्ष आपने ही लगाया था। अब यह तीनों तापों की आग से झुलसकर मुरझा गया है। कृपया इस ओर देखकर अपनी करुणा-रूपी जल से इसे सींचिये।
हे कृपा के भंडार श्रीराम! आप भूतकाल, वर्तमान और भविष्य के, अपने और पराये सबकी अवस्था और रीति भली-भाँति जानते हैं।
पंय पीर पेट पीर बह पीर मुंह पीर,
जरजर सकल पीर मई है ।
देव भूत पितर करम खल काल ग्रह,
मोहि पर दवरि दमानक सी दई है ॥
हौ तो बिनु मोल के बिकानो बलि बारेही तें,
ओट राम नाम की ललाट लिखि लई है ।
कुंभज के कंकर बिकल बूढ़े गोखुरनि,
हाय राम राय ऐसी हाल कहूं भई है ॥३८॥
अर्थ: पाँव की पीड़ा, पेट की पीड़ा, बाहु की पीड़ा और मुख की पीड़ा- मेरा पूरा शरीर पीड़ा से भरकर जीर्ण-शीर्ण हो गया है।
देवता, भूत, पितर, कर्म, दुष्टजन, काल और ग्रह ये सब एक साथ मुझ पर टूट पड़े हैं, मानो मुझ पर तोपों की कतार से प्रहार किया जा रहा हो।
बलि जाता हूँ, मैं तो बचपन से ही बिना मूल्य के आपका बिक चुका हूँ। मैंने अपने मस्तक पर रामनाम का आश्रय लिख लिया है।
हाय! हे राजा रामचन्द्रजी! क्या कभी ऐसा भी हुआ है कि अगस्त्य मुनि का सेवक गाय के खुर के गड्ढे में डूबकर व्याकुल हो जाए?
बाहुक-सुबाहु नीच लीचर-मरीच मिलि,
मुंहपीर केतुजा कुरोग जातुधान हैं ।
राम नाम जगजाप कियो चहों सानुराग,
काल कैसे दूत भूत कहा मेरे मान हैं ॥
सुमिरे सहाय राम लखन आखर दोऊ,
जिनके समूह साके जागत जहान हैं ।
तुलसी संभारि ताडका संहारि भारि भट,
बेधे बरगद से बनाइ बानवान हैं ॥३९॥
अर्थ: बाँह की पीड़ा नीच राक्षस सुबाहु के समान, देह की दुर्बलता मारीच के समान, मुख की पीड़ा ताड़का के समान और अन्य बुरे रोग केतुज (ग्रहजन्य) राक्षसों जैसे हैं, ये सब मिलकर मुझे पीड़ा दे रहे हैं।
मैं प्रेमपूर्वक रामनाम-जप रूपी यज्ञ करना चाहता हूँ, किंतु ये कालदूत जैसे भूत-प्रेत और रोग मेरे वश में नहीं हैं।
जिस दो अक्षरों की महान कीर्ति से सारा संसार जाग रहा है अब मैं उनका स्मरण करता हूँ अब वो ही मेरी सहायता करेंगे।
हे तुलसी! ताड़का का वध करने वाले उस महान योद्धा (श्रीराम) का स्मरण कर। वे इन रोग-राक्षसों को अपने बाणों से ऐसे भेद देंगे जैसे बरगद के फल को तीर भेद देता है।
बालपने सूथे मन राम सनमुख भयो,
राम नाम लेत मांगि खात टूकटाक हां ।
परयो लोक-रीति में पुनीत प्रीति राम राय,
मोह बस बैठो तोरि तरकि तराक हौ ॥
खोटे-खोटे आचरन आचरत अपनायो,
अंजनी कुमार सोध्यो रामपानि पाक हौ ।
तुलसी गुसांई भयो भोंडे दिन भूल गयो,
ताको फल पावत निदान परिपाक हौं ॥४०॥
अर्थ: मैं बाल्यावस्था से ही सीधे मन से श्रीरामचन्द्रजी के सम्मुख हुआ मुँह से रामनाम लेता हुआ टुकड़ा-टुकड़ी माँगकर जीवन यापन करता था।
फिर लोक-रीति (सांसारिक व्यवहार) में पड़कर, मोहवश मैंने राजा रामचन्द्रजी के चरणों की पवित्र प्रीति को छोड़ दी और संसार में कूद पड़ा।
जब मैं खोटे-खोटे आचरण करने लगा, तब अंजनीनन्दन हनुमान जी ने मुझे अपनाया और श्रीरामचन्द्रजी के पवित्र हाथों से मेरा सुधार करवाया।
तब मैं तुलसीदास कहलाया, पुराने बुरे दिन भूल गए और अब उन्हीं कर्मों का फल आज अच्छी तरह पा रहा हूँ।
असन-बसन-हीन बिषम-बिषाद-लीन,
देखि दीन दूबरो करै न हाय हाय को ।
तुलसी अनाथ सो सनाथ रघुनाथ कियो,
दियो फल सील सिंधु आपने सुभाय को ॥
नीच यहि बीच पति पाइ भरु हाईगो,
बिहाइ प्रभु भजन बचन मन काय को |
ता तें तनु पेषियत घोर बरतोर मिस,
फूटि फूटि निकसत लोन राम राय को ॥४१॥
अर्थ: मुझे भोजन और वस्त्र से रहित, गहरे विषाद में डूबा हुआ, अत्यन्त दीन और दुर्बल देखकर ऐसा कौन था जो करुणा से “हाय-हाय” न करता?
ऐसे अनाथ तुलसी को दयासागर रघुनाथजी ने सनाथ बनाया और अपने करुण स्वभाव से उत्तम फल प्रदान किया।
पर इसी बीच यह नीच (मैं) प्रतिष्ठा पाकर घमण्ड से भर गया और तन, मन तथा वाणी से प्रभु का भजन छोड़ बैठा।
इसी कारण शरीर में घोर पीड़ा और फोड़े-फुंसियों के बहाने ऐसा प्रतीत होता है मानो राजा रामचन्द्रजी का नमक (ऋण) फूट-फूटकर बाहर निकल रहा हो।
जीओं जग जानकी जीवन को कहाइ जन,
मरिबे को बारानसी बारि सुरसरि को ।
तुलसी के दुहूं हाथ मोदक हैं ऐसे ठांउ,
जाके जिये मुये सोच करिहैं न लरि को
मोको झूटो सांचो लोग राम को कहत सब,
मेरे मन मान है न हर को न हरि को ।
भारी पीर दुसह सरीर ते बिहाल होत,
सोऊ रघुबीर बिनु सके दूर करि को ॥४२॥
अर्थ: मैं संसार में जानकी-जीवन श्रीराम का दास कहलाकर जीऊँ और मरने के लिए काशी तथा गंगाजल (सुरसरि) का तट मुझे प्राप्त हो।
ऐसी अवस्था में तुलसी के दोनों हाथों में लड्डू हैं—अर्थात् जीवन और मृत्यु दोनों ही शुभ हैं, जिनके होने या न होने से किसी को चिंता करने की आवश्यकता नहीं।
लोग मुझे सच्चा या झूठा, जो भी कहें, सब मुझे राम का ही दास कहते हैं। मेरे मन में भी यह दृढ़ मान है कि मैं न शिव का हूँ, न विष्णु का, केवल राम का हूँ।
शरीर की भारी और असहनीय पीड़ा से मैं अत्यन्त व्याकुल हो रहा हूँ। इस पीड़ा को श्रीरघुवीर के अतिरिक्त और कौन दूर कर सकता है?
सीतापति साहेब सहाय हनुमान नित,
हित उपदेश को महेस मानो गुरु कै ।
मानस बचन काय सरन तिहारे पाय,
तुम्हरे भरोसे सुर मैं न जाने सुर कै ॥
व्याधि भूत जनित उपाधि काहु खल की,
समाधि कीजे तुलसी को जानि जन फुर कै ।
कपिनाथ रघुनाथ भोलानाथ भूतनाथ,
रोग सिंधु क्यों न डारियत गाय खुर कैः ॥४३॥
अर्थ: हे हनुमान जी! सीतापति श्रीराम सदा आपके सहायक हैं और हितोपदेश देने के लिए महादेव मानो आपके गुरु ही हैं।
मैं मन, वचन और शरीर से आपके चरणों की शरण में हूँ। आपके भरोसे रहते हुए मैंने देवताओं को भी देवता मानकर नहीं पूजा।
रोग, भूत-प्रेत या किसी दुष्ट के कारण उत्पन्न पीड़ा को दूर कर तुलसी को अपना सच्चा सेवक जानकर इसकी शान्ति कर दीजिए।
हे कपिनाथ! हे रघुनाथ के प्रिय! हे भोलानाथ और भूतनाथ! इस रोग-रूपी महासागर को गाय के खुर के समान छोटा क्यों नहीं कर देते?
कहों हनुमान सों सुजान राम राय सों,
कृपानिधान संकर सों सावधान सुनिये ।
हरष विषाद राग रोष गुन दोष मई,
बिरची बिरञ्ची सब देखियत दुनिये ॥
माया जीव काल के करम के सुभाय के,
करैया राम बेद कहैं सांची मन गुनिये ।
तुम्ह तं कहा न होय हा हा सो बुझैये मोहि,
हौ हूं रहों मौनही बयो सो जानि लुनिये ॥४४॥
अर्थ: मैं श्री हनुमान से, सुजान राजा राम से और कृपानिधान शंकरजी से निवेदन करता हूँ, कृपया ध्यान देकर सुनिए।
यह संसार हर्ष-विषाद, राग-रोष, गुण-दोष से भरा हुआ है, ऐसा विधाता ने ही बनाया है, यह प्रत्यक्ष दिखाई देता है।
वेद कहते हैं कि माया, जीव, काल, कर्म और स्वभाव, इन सबके कर्ता श्रीराम हैं। मैंने इस सत्य को मन से स्वीकार कर लिया है।
अब मुझे यह समझा दीजिए कि ऐसा क्या है जो आपसे नहीं हो सकता। तब मैं यह जानकर मौन रहूँगा कि जैसा बोया है, वैसा ही काट रहा हूँ।
॥ इति श्री हनुमान बाहुक सम्पूर्णं ॥
इसे भी पढ़ें : पंचमुखी हनुमान कवच
हनुमान बाहुक पाठ हिंदी में PDF
यदि आप भी अपने जीवन में संकट, भय और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति चाहते हैं, तो हनुमान बाहुक पाठ हिंदी में PDF डाउनलोड कर नियमित रूप से इसका पाठ करें।
हनुमान बाहुक PDF Download

हनुमान बाहुक पाठ करने की विधि
पंचमुखी हनुमान कवच के समान हीं हनुमान बाहुक भी भक्तों के जीवन से संकट, भय, रोग और बाधाओं को दूर करने वाला एक प्रभावशाली स्तोत्र है।
जो मनुष्य भी श्रद्धा और भक्ति के साथ सही विधि से इसका पाठ करता है, उसके जीवन में हनुमान जी की कृपा, सुरक्षा और शक्ति स्थायी रूप से स्थापित हो जाती है।
तो चलिए अब हम जानते हैं कि हनुमान बाहुक के पाठ की सरल और सटीक विधि क्या है।
हनुमान बाहुक पाठ विधि
- प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त बेला में हनुमान बाहुक का पाठ करना सर्वोत्तम माना गया है परन्तु यदि ये संभव नहीं हो सके तो आप इसका पाठ संध्या काल में भी कर सकते हैं।
- सबसे पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें
- अब अपने घर के मंदिर में हनुमान जी की प्रतिमा या चित्र को स्थापित कर उनके समक्ष बैठ जाएँ
- तत्पश्चात हनुमान जी के सामने घी या तेल का दीप जलाएँ
- हो सके तो हनुमान जी के चरणों में लाल पुष्प अर्पित करें
- अब सबसे पहले हनुमान जी के आराध्य भगवान् श्रीराम का स्मरण करें
- “ॐ नमो भगवते हनुमते नमः” मंत्र का 3 या 11 बार जाप करें
- अब सच्ची श्रद्धा और एकाग्र मन से हनुमान बाहुक का संपूर्ण पाठ करें, ध्यान रहे कि आप पाठ के समय बीच में रुकें नहीं
- पाठ पूर्ण होने पर हनुमान जी से अपनी पीड़ा और कष्ट के निवारण की प्रार्थना करें
- हनुमान बाहुक का पाठ आप प्रतिदिन करें, और यदि ऐसा नहीं कर सकें तो प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को इसका पाठ अवश्य करें।
- कम से कम 11 दिन और यदि कष्ट गंभीर हो तो इसका पाठ 21 या 40 दिन तक करें
इसे भी पढ़ें : हनुमान गायत्री मंत्र
हनुमान बाहुक पाठ के लाभ
हनुमान बाहुक गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित एक अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है, जिसमें हनुमान जी से सम्बंधित ४४ छंद हैं। मान्यता है कि तुलसीदास जी ने स्वयं गंभीर बाहु-पीड़ा अर्थात बाँह के दर्द से मुक्ति पाने के लिए इसकी रचना की थी और हनुमान जी की कृपा से वे पूर्णतः स्वस्थ हो गए थे। इसका नियमित पाठ करके आप भी अनेक चमत्कारी लाभ को प्राप्त कर सकते हैं।
हनुमान बाहुक पाठ के लाभ
हनुमान बाहुक का भक्तिपूर्वक किया गया पाठ से शारीरिक रोग और पीड़ा विशेषकर जोड़ों का दर्द, गठिया, बाहु-पीड़ा, स्नायु-दौर्बल्य, वात-रोग आदि में आश्चर्यजनक लाभ मिलता है।
इस स्तोत्र का पाठ से मन की बेचैनी, चिंता, अनिद्रा, तनाव और भय धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं।
हनुमान बाहुक साधक के जीवन से ग्रह बाधा जैसे शनि, राहु-केतु, मंगल आदि ग्रहों की अशुभता के प्रभाव को कम करता है।
इस स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक किया गया पाठ मनुष्य को नकारात्मक शक्तियों जैसे बुरी नजर, टोना-टोटका, भूत-प्रेत आदि से सुरक्षा प्रदान करता है।
इसके निरंतर पाठ से साधक के मन में दृढ़ता, साहस और आत्मबल की वृद्धि होती है।
तुलसीदास कृत हनुमान बाहुक का पाठ से जीवन में सभी प्रकार के शत्रुओं द्वारा निर्मित बाधा दूर होती हैं और उनके बुरे प्रभाव समाप्त हो जाते हैं। साथ हीं अकस्मात आने वाले संकटों से भी साधक की रक्षा होती है।
हनुमान बाहुक का नियमित पाठ करने वाले व्यक्ति के चारों ओर एक सुरक्षा कवच का निर्माण हो जाता है, जिससे साधक का अनिष्ट नहीं होता है।
हनुमान बाहुक FAQ
हनुमान बाहुक क्या है?
हनुमान बाहुक गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित एक स्तोत्र है, जिसमें 44 छंद हैं। इसे तुलसीदास जी ने अपनी गंभीर बाँह-पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए हनुमान जी के आदेश पर रचा था।
क्या इसका हिंदी में अर्थ सहित पाठ कर सकते हैं?
हाँ, अर्थ समझकर पाठ करने से भावना गहरी होती है और इसका प्रभाव और भी बढ़ता है। अतः यदि आप इसे मूल भाषा में नहीं पढ़ पा रहे हों तो आप इसका हिंदी में अर्थ सहित भी पाठ कर सकते हैं।
महिलाएं हनुमान बाहुक पाठ कर सकती हैं?
हाँ, बिल्कुल कर सकती हैं। कोई भी व्यक्ति बिना जाति-लिंग भेद के श्रद्धा से पाठ कर सकता है। केवल मासिक धर्म के दिनों में कुछ परंपराओं में स्पर्श न करने की सलाह दी जाती है।
क्या इसे रोज पढ़ना ज़रूरी है?
नियमित पाठ सर्वोत्तम माना गया है, पर यदि संभव न हो तो मंगलवार और शनिवार को पाठ अवश्य करें।
कितने दिनों में प्रभाव दिखता है?
यह पूर्ण रूप से साधक के श्रद्धा, नियमितता और भावना पर निर्भर करता है। कुछ लोगों को कुछ दिनों में ही लाभ मिलता है, जबकि गंभीर समस्याओं में 40 दिन का नियमित अनुष्ठान शास्त्रों में सुझाया गया है।
निष्कर्ष
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित यह हनुमान बाहुक पाठ अर्थ सहित करने से शारीरिक पीड़ा और मानसिक संताप से निश्चित हीं मुक्ति मिलती है ।
इस लेख में हमने आपको हनुमान बाहुक पाठ करने की विधि विस्तार से बताई, जिससे आप इसे सही नियम, समय और भावना के साथ कर सकें। साथ ही हनुमान बाहुक पाठ के लाभ को भी स्पष्ट किया कि कैसे यह शारीरिक पीड़ा, मानसिक तनाव, ग्रह दोष और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति दिलाता है।
जो साधक संपूर्ण पाठ को सरल रूप में पढ़ना चाहते हैं, वे हनुमान बाहुक पाठ हिंदी में PDF के माध्यम से इसे सुरक्षित रखकर नित्य पाठ कर सकते हैं। और हनुमान जी की कृपा से अपने जीवन में साहस, शक्ति और शांति का प्रकाश फैलाएं।
जय श्रीराम! जय हनुमान!